

आष्टा- अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की स्थानीय इस्कॉन संस्था आष्टा द्वारा भगवान जगन्नाथ बलदेव एवं सुभद्रा महारानी के दिव्य रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन किया। इस आयोजन में सैकड़ो की तादाद में अनुयायी हरे रामा हरे कृष्णा जय जगन्नाथ के घोष के साथ बरसते पानी में सड़कों पर भक्तिमय आनंद के साथ झूमते हुए नजर आए। नगर के गायत्री मंदिर से प्रारंभ होकर भोपाल नाका से कन्नौद रोड होते हुए गीतांजलि गार्डन पहुंची जहां पर महाप्रसादी का आयोजन किया गया।

पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कैलाश परमार ने इस्कॉन सेंटर आष्टा द्वारा आयोजित प्रभु जगन्नाथ भगवान, भगवान बलदेव एवं सुभद्रा महारानी को नमन किया एवं प्रभु स्वामी जी का सम्मान किया एवं यात्रा समिति के अध्यक्ष ओमप्रकाश पाटीदार महामंत्री हरिओम कटारिया सचिव नवीन पंचांग नवीन एग्रो कोषाध्यक्ष सुरेंद्र सोनी उपाध्यक्ष चंद्रेश माथुर अनिल भाटी एवं संस्था के अन्य सदस्यों का पूर्व पार्षद एवं सकल हिन्दू समाज अध्यक्ष नरेंद्र कुशवाह समाजसेवी अर्जुन सिंह अजय आदि के साथ सम्मान व्यक्त कर अनुमोदना की।

आष्टा। भगवान श्री जगन्नाथ जी अपनी मौसी के घर आनंद धाम पधारे है उस उपलक्ष्य में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के द्वितीय दिवस श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ कथा का श्रवण किया। कथा व्यास गादी से पंडित कन्हैयालाल शर्मा ने भक्ति के लक्षणों का वर्णन करते हुए राजा दक्ष, महाराज भरत एवं माता अनुसूइया के जीवन प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया कहा कि भक्ति मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने का सबसे सरल और श्रेष्ठ साधन है। सच्ची भक्ति में अहंकार, छल, कपट, ईर्ष्या और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता।

भगवान का नाम-स्मरण, सत्संग, कथा श्रवण, सेवा और परोपकार ही सच्चे भक्त के लक्षण हैं। ऐसे व्यक्ति के जीवन में दया, क्षमा, प्रेम, विनम्रता, संतोष और समर्पण स्वतः आ जाते हैं। राजा दक्ष की कथा सुनाते हुए बताया कि वे प्रजापतियों में श्रेष्ठ और अत्यंत प्रतापी राजा थे, लेकिन उन्हें अपने पद और यज्ञ का अहंकार हो गया। इसी अहंकार के कारण उन्होंने भगवान शिव का अपमान किया और अपने यज्ञ में उन्हें आमंत्रित नहीं किया। जब माता सती बिना निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में पहुँचीं और वहां भगवान शिव का अपमान देखा, तो उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।

इसके बाद भगवान शिव के गण वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। अंततः राजा दक्ष ने अपनी भूल स्वीकार कर भगवान शिव से क्षमा मांगी। कथा के माध्यम से बताया गया कि अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है, जबकि विनम्रता और क्षमा जीवन को महान बनाती है। महाराज भरत का चरित्र सुनाते हुए पंडित शर्मा ने बताया कि वे राजा ऋषभदेव के ज्येष्ठ एवं प्रतापी पुत्र थे। महाराज भरत के अद्वितीय पराक्रम, धर्मपालन, न्यायप्रिय शासन और आध्यात्मिक जीवन के कारण इस देश का नाम “भारतवर्ष” पड़ा।

उन्होंने कहा कि महाराज भरत केवल महान शासक ही नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और वैराग्य के प्रतीक भी थे। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने राज्य का त्याग कर भगवान की भक्ति और तपस्या का मार्ग अपनाया। उनके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि सांसारिक वैभव क्षणभंगुर है, जबकि ईश्वर की भक्ति और धर्म ही मनुष्य की वास्तविक संपत्ति है माता अनुसूइया के पवित्र चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि वे पतिव्रता धर्म, तपस्या, करुणा और मातृत्व की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति थीं। उनके तप और सतीत्व की महिमा से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने बाल स्वरूप धारण किया।

माता अनुसूइया का जीवन नारी शक्ति, त्याग, सेवा, संयम और संस्कारों का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने बताया कि परिवार और समाज में सदाचार एवं धार्मिक मूल्यों की स्थापना में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने का माध्यम है। कथा के श्रवण से मनुष्य के विचारों में पवित्रता आती है, जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है तथा समाज में प्रेम, सद्भाव और धर्म की स्थापना होती है। धर्माधिकारी गजेंद्र शर्मा ने बताया कि आनंद धाम, बुधवारा में 17 जुलाई से 23 जुलाई 2026 तक

प्रतिदिन दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का आयोजन किया जा रहा है। पंडित भवानी शंकर शर्मा एवं पंडित गजेंद्र शास्त्री धर्माधिकारी ने समस्त नगरवासियों से कथा में पधारकर धर्म लाभ लेने की अपील की।भागवत कथा में आज भवानी शंकर शर्मा, जगदीश पाटीदार, बृजमोहन सोनी, पिंकी शर्मा, शिव श्रीवादी, दीपेश गौतम, शीला शर्मा, राधा शर्मा, आनंद नेहा शर्मा, रमा प्रतिभा शर्मा, चंद्रेश माधवी शर्मा, मधुराज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं भक्तगण उपस्थित रहे तथा श्रद्धापूर्वक श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का श्रवण कर धर्म लाभ प्राप्त किया।


