
पार्श्वनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक महोत्सव आज, किला मंदिर में होंगे विविध धार्मिक आयोजन, मुनि संघ के सानिध्य में निर्वाण लाडू समर्पित कर मनाया जाएगा मुकुट सप्तमी पर्व, नेमिनाथ भगवान का जन्म और तप कल्याणक मनाया, राष्ट्रीय पर्व स्वाभिमान और गर्व का पर्व, धर्म में लड़ाई नहीं कर्तव्य होना चाहिए—मुनि सागर महाराज


आष्टा। श्री 1008 भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक महापर्व श्रावण शुक्ल सप्तमी (मुकुट सप्तमी) के अवसर पर बुधवार, 19 अगस्त को श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर में धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। कार्यक्रम परम पूज्य मुनि श्री मुनिसागर जी महाराज, मुनि श्री अभेदसागर जी महाराज, मुनि श्री अगर्भसागर जी महाराज एवं ऐलक श्री मंथनसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में आयोजित होगा।श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर स्थित आचार्य विद्यासागर धर्म सभागार में समाधि सम्राट वात्सल्य रत्नाकर मुनिराज भूतबलि सागर महाराज के

परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय पर्व स्वाभिमान और गर्व का पर्व है। धर्म और कर्म में आगे रहें तथा लड़ाई में पीछे रहें। देश की रक्षा के लिए संघर्ष आवश्यक हो सकता है, लेकिन धर्म के कार्य में लड़ाई नहीं होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जीवन में कम खाना, कम बोलना और संसार से आसक्ति कम रखना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अपने घर पर भी राष्ट्रीय ध्वज फहराकर राष्ट्रीय पर्व के प्रति सम्मान और गौरव की भावना व्यक्त करे। भावना और प्रभावना के साथ

अपने कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए।पूजा में शुद्धता और मर्यादा जरूरीमुनि श्री ने कहा कि भगवान की पूजा-अर्चना में उपयोग होने वाली सामग्री शुद्ध होना चाहिए। भगवान का अभिषेक शुद्ध जल से ही करें और अमर्यादित द्रव्यों का उपयोग न करें। आहारदान और औषधिदान में भी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। जीवदया का भाव जीवन में होना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि भगवान के अभिषेक के बाद जल को छानकर बहते हुए जल में डालना चाहिए, ताकि जल में रहने वाले जीवों की रक्षा हो सके। भगवान के अभिषेक, पूजन और अपने भोजन में भी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए।

उन्होंने श्रावकों से शुद्ध-अशुद्ध भोजन के प्रति जागरूक रहने तथा जैन कुल में जन्म लेने के अनुरूप शुद्ध आहार ग्रहण करने का आग्रह किया।मुनि श्री ने कहा कि “जो करेगा, वह भरेगा।” इसलिए पंथवाद से दूर रहकर धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। मान-सम्मान के कारण उत्पन्न होने वाली घटनाओं को केवल काल के ऊपर नहीं डालना चाहिए, बल्कि स्वयं उसका निराकरण करना चाहिए। सभी को साथ लेकर चलने वाला व्यक्ति ही वास्तव में बड़ा होता है।नेमिनाथ भगवान के जीवन से वैराग्य की प्रेरणामुनि श्री सागर महाराज ने भगवान नेमिनाथ के जीवन प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि

विवाह के अवसर पर जीवों के प्रति करुणा का भाव जागृत होने पर नेमिनाथ भगवान को वैराग्य हो गया और वे गिरनार पर्वत की ओर चले गए। राजुल ने भी वैराग्य धारण कर दीक्षा लेकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया।उन्होंने कहा कि सुखमय जीवन में भी वैराग्य जागृत हो सकता है। जीवन में कहीं भी विषमता आए तो मन को स्थिर रखना चाहिए। क्रोध व्यक्ति को नारकीय भावों की ओर ले जाता है, जबकि क्षमा का भाव मनुष्य को देवतुल्य बना देता है। बदले की भावना कभी नहीं रखना चाहिए। क्षमाभाव रखना ही धर्म का सार है।मुनि श्री ने कहा कि चातुर्मास की वास्तविक उपलब्धि तभी होगी, जब हमारे जीवन में समभाव आए। ऐसा कार्य करें कि आने वाली पीढ़ियां हमें याद करें। मनुष्य बनकर जन्म लिया है

तो अपने आचरण से देवत्व प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। जिसने हमारे साथ अच्छा या बुरा किया है, उसकी बातों को हमेशा मन में रखकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि उन्हें भूलकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।इस अवसर पर मुनि श्री अगर्भ सागर महाराज ने कहा कि यश-कीर्ति के लिए नहीं, बल्कि अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए कार्य करना चाहिए। यश-कीर्ति व्यक्ति के कर्म और भाग्य से जुड़ी होती है। जिसके भाग्य में यश नहीं है, वह कितना भी प्रयास करे, उसे यश नहीं मिलेगा। इसलिए परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और मुनि संघ के आशीर्वचनों का श्रवण कर धर्मलाभ लिया।आचार्य विद्यासागर धर्म सभागार में मुनि अगर्भ सागर महाराज ने आशीर्वचन में अगर्भ सागर महाराज ने कहा कि यश कीर्ति के लिए नही अपने दायित्वों का निर्वहन करें। जिसके किस्मत में यश कीर्ति नहीं है वो कितना ही कर लें उसको यश नहीं मिलेगा।क्षमाभाव और मर्यादित जीवन का दिया संदेश। श्री दिगंबर जैन पंचायत समिति, श्री मुनि सेवा समिति एवं चातुर्मास धर्म प्रभावना संघ के तत्वावधान में

पार्श्वनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर होने वाले आयोजन की शुरुआत किला मंदिर पर सुबह 7 बजे नित्य शांति धारा से होगी। इसके बाद मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ का मस्तकाभिषेक, संगीतमय जिनपूजन एवं भगवान को निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा। आयोजन के पश्चात मुनि संघ के आशीर्वचन होंगे।धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक जैन धर्म के प्रमुख आध्यात्मिक पर्वों में से एक है। इस अवसर पर श्रद्धालु भगवान की आराधना, अभिषेक एवं पूजन कर आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की भावना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बनेंगे।आयोजकों ने समस्त साधर्मी बंधुओं, माताओं एवं बहनों से आयोजन में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर धर्मलाभ लेने और पुण्यार्जन करने का आग्रह किया है।

