

आष्टा। मालव गिरनार आष्टा तीर्थ श्री नेमिनाथ श्वेतांबर जैन मंदिर किला के उपाश्रय में मंगलवार को 11 उपवास की कठिन तपस्या पूर्ण करने वाली कुमारी समृद्धि सुपुत्री पीयूष-सोनम देशलहरा की तपस्या की अनुमोदना की गई। श्री नेमिनाथ प्रभु की छत्रछाया एवं चातुर्मासार्थ विराजित पन्यास प्रवर यशोजीत विजयजी महाराज साहब आदि ठाणा एवं साध्वीवर्या श्री वैराग्यश्रेया श्रीजी म.सा. आदि ठाणा के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन, स्नेहीजन एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।पन्यास प्रवर यशोजीत विजय महाराज ने तपस्विनी समृद्धि को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इतनी छोटी उम्र में कठिन तपस्या कर समृद्धि ने धर्म प्रभावना के साथ परिवार और समाज का गौरव बढ़ाया है।

उन्होंने कहा कि तपस्या के लिए दृढ़ संकल्प, गुरुजनों का आशीर्वाद और परिवार का सहयोग आवश्यक होता है। समृद्धि ने इन तीनों के साथ अपनी साधना पूर्ण कर प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है।”मोक्ष रास्ते में पड़ा नहीं मिलता, कर्मों की निर्जरा करनी होगी”मंगल प्रवचन में पन्यास प्रवर यशोजीत विजय महाराज ने कहा कि मोक्ष रास्ते में पड़ा हुआ नहीं है। लोग जीवनभर पैसा-पैसा करते रहते हैं, लेकिन पैसा भी रास्ते में पड़ा नहीं मिलता। यदि नए कर्मों को रोकना है तो संवर करना होगा और पुराने कर्मों का क्षय करने के लिए तपस्या आवश्यक है।उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के लिए तप और संयम जरूरी हैं।

संसार असार है और इसका वास्तविक सार मोक्ष में है। व्यक्ति को बाहरी सुख-सुविधाओं के बजाय आत्मा के सुख का भंडार तलाशना चाहिए। मन की पवित्रता बढ़ेगी, तभी कर्मों की निर्जरा होगी।महाराजश्री ने कहा कि केवल भूखा रहना उपवास नहीं है। उपवास के दौरान प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, पूजा-अर्चना और आत्मचिंतन भी होना चाहिए। जब तपस्या के साथ मन से राग-द्वेष कम होने लगे और आत्मचिंतन बढ़े, तभी तपस्या निर्जरा का माध्यम बनती है।उन्होंने पर्युषण महापर्व के दौरान ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने, एकासना एवं उपवास सहित धर्म आराधना करने का

आह्वान किया। युवाओं में बढ़ती पाश्चात्य संस्कृति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, सीए अथवा अन्य बड़े पदों पर पहुंचने के लिए तो पढ़ाया जाता है, लेकिन उन्हें आत्मज्ञान और संस्कारों की शिक्षा देना भी उतना ही जरूरी है। परीक्षा में कम अंक आने पर बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। बच्चे भले ही कम कमाए लेकिन व्यवसाय करें।उन्होंने कहा कि कम प्रतिशत आने पर बच्चे निराश हो जाते हैं। ऐसे समय में माता-पिता को बच्चों को यह समझाना चाहिए कि जीवन की सफलता केवल अंकों और पदों से नहीं मापी जाती। ज्ञान की गंगा में स्नान

कर अपनी आत्मा को पवित्र बनाना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।”तप के बाद समता भाव आए, अभिमान नहीं : वीरतेन्द्र महाराज”इस अवसर पर वीरतेन्द्र महाराज ने कहा कि जैन दर्शन में दर्शन, ज्ञान और चारित्र की आराधना के बाद तप की आराधना बताई गई है। तप धर्म आत्मा को तपाने और कर्मों की निर्जरा करने का माध्यम है। बड़ी तपस्या करना उत्तम है, लेकिन यदि बड़ी तपस्या संभव न हो तो उणोदरी तप भी किया जा सकता है। अर्थात भोजन करते समय अपनी भूख से कुछ कम भोजन करना भी तप की साधना है।उन्होंने कहा कि तपस्या पूर्ण होने के बाद व्यक्ति में समता भाव आना चाहिए, अभिमान नहीं। मनुष्य को अपनी प्रशंसा में सबसे अधिक आनंद मिलता है, इसलिए तपस्या के बाद अहंकार से बचना और विनम्रता को जीवन में उतारना जरूरी है।

“पहले भी कर चुकी हैं 8 और 9 उपवास”जैन धर्म की महान तप एवं संयम परंपरा को आगे बढ़ाते हुए साधना -दिवंगत संतोष देशलहरा की पौत्री एवं पीयूष-सोनम की पुत्री कुमारी समृद्धि ने 11 उपवास की कठिन तपस्या पूर्ण की। विशेष बात यह है कि समृद्धि इसके पूर्व भी बीते वर्षों में 8 और 9 उपवास की कठिन तपस्या कर चुकी हैं। श्रीसंघ अध्यक्ष पवन सुराणा एवं किला मंदिर ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष रवींद्र रांका, चातुर्मास समिति अध्यक्ष दिनेश सुराना एवं समाज के विभिन्न मंडलों, महिला मंडलों द्वारा तपस्विनी समृद्धि देशलहरा का बहुमान किया गया। दोपहर 2 बजे महिलाओं द्वारा चौबीसी भजन एवं भक्ति का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं ने उत्साह और उमंग के साथ सहभागिता की।

समाजजनों ने किया तपस्विनी का बहुमानसमृद्धि की तपस्या की अनुमोदना के लिए बड़ी संख्या में समाजजन एवं स्नेहीजन उपस्थित रहे। विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं समाज के मंडलों द्वारा तपस्विनी का बहुमान कर उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक जीवन की मंगलकामना की गई।समृद्धि की 11 उपवास की तपस्या विशेष रूप से युवा वर्ग के लिए प्रेरणादायी रही। उनकी तपस्या ने यह संदेश दिया कि दृढ़ संकल्प, गुरुजनों के आशीर्वाद और परिवार के सहयोग से कठिन से कठिन त्याग, तपस्या और साधना भी पूर्ण की जा सकती है।कार्यक्रम के दौरान पूरा उपाश्रय परिसर भक्ति, तपस्या की अनुमोदना और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा।उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने तपस्विनी के तप की अनुमोदना करते हुए स्वयं भी संयम, स्वाध्याय और धर्म आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
