

आष्टा। जरूरत से ज्यादा बातचीत, जरूरत से भी ज्यादा लगाव, जरूरत से ज्यादा उम्मीद और जरूरत से ज्यादा भरोसा अक्सर अंत में जरूर से ज्यादा कष्ट देता है। इसलिए जीवन में हर कार्य को मर्यादा में करें। क्योंकि जहां अति, वहां छती। इसलिए, ना अति का बोलना, ना अति कि चुप। ना अति का बरसाना, ना अति की धूप।क्योंकि कांटा जितना गहरा लगा हो, निकालने में उतना ही ज्यादा कष्ट देता है। ऊक्त बहुत ही अनुकरणीय विचार शांति नगर में चल रही सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत

कथा के तृतीय दिवस मालवा क्षेत्र के सुप्रसिद्ध भागवत कथा कार संत श्री मिट्ठूपुरा सरकार द्वारा व्यक्त किए गए। आगे संत श्री द्वारा बताया गया कि कि व्यक्ति को बाहरी शत्रुओं से उतना खतरा नहीं है। जितना उसके अंदर बैठे हुए काम, क्रोध ,मद ,लोभ यह बड़े खतरनाक शत्रु होते हैं।इन पर विजय प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। संसार में कुछ बिरले लोग ही होते हैं। जो इनके ऊपर शासन करते हैं। नाथ तीन अति प्रबल खल, काम क्रोध अरु लोभ। जिस व्यक्ति ने इनको जीत लिया। सही अर्थों में वही बलवान है ।

वही विजेता है। रावण, कंस, दुर्योधन मैं यह सभी दुर्गुण विद्ममान थे। इसलिए इन सभी का पतन हो गया। अहंकार में तीन गए, धन वैभव और वंश। ना मानो तो देख लो, रावण कौरव कंस। आज विश्वकर्मा समाज समिति आष्टा द्वारा पूज्य संत श्री का शाल साफा श्रीफल भेंट कर स्वागत किया। आज चतुर्थ दिवस भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। इस अवसर पर मनोहर लाल विश्वकर्मा, इंदर सिंह ठाकुर, मेहरबान सिंह विश्वकर्मा, कल्याण सिंह अध्यापक, शंकर लाल विश्वकर्मा, राजेश डोंगरे, महेश अवलेसिया शिव श्री वादी, सहित बड़ी तादाद में उपस्थित श्रोताओं द्वारा कथा का रसपान किया।

